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वक्री ग्रह और उनका ज्योतिष में महत्व

वक्री ग्रह का कुंडली में उपस्थित होना कुछ विशेष संकेत देता है जो वैदिक ज्योतिष के पूर्व जन्म के ऋणों को दर्शाता है। इसलिए जिस कुंडली में वक्री ग्रह हों वहां फल कथन बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाता है।

वक्री ग्रह किसी भी जातक की कुंडली में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं क्योंकि ज्योतिष के अनुसार इन्हें विशेष रूप से चेष्टा बल मिलता है। चेष्टा बल का अर्थ है किसी वस्तु स्थिति के प्रति चेष्टा रखना अर्थात कोई भी ग्रह जब वक्री होता है तो जिस भाव और कारकत्व को लेकर वह उपस्थित है वक्री होने पर उन कार्यों के प्रति विशेष मेहनत करवाता है ताकि व्यक्ति की सोच उस वस्तु अथवा व्यक्ति अथवा रिश्ते के प्रति अधिक गहन हो सके।

यदि कोई ग्रह कुंडली में वक्री अवस्था में स्थित है तो उसका फल अन्य ग्रहों के मुकाबले अलग तरीके से जाना जाता है। सामान्य तौर पर ऐसा माना जाता है कि शुभ ग्रह वक्री होने पर अति शुभ और अशुभ ग्रह वक्री होने पर अति अशुभ फल देने लग जाते हैं। हालांकि इस स्थिति में ग्रह का कुंडली के सापेक्ष कारक होना मुख्य ध्यान देने का विषय होता है। आइये अब यह जानते हैं कि वास्तव में ग्रहों की वक्री अवस्था क्या होती है?

वक्री ग्रह क्या है

वक्री ग्रह को कुंडली में विशेष ध्यान से देखना चाहिए। ग्रहों की कक्षा अंडाकार है जिसके कारण पृथ्वी से उनकी दूरी में परिवर्तन आता है। ऐसे में जब कोई ग्रह उल्टा चलता प्रतीत होता है तो उसे वक्री ग्रह कहा जाता है। वास्तव में कोई ग्रह उल्टा नहीं चलता लेकिन परिभ्रमण पथ की स्थिति के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि वह उल्टी दिशा में जा रहा है।

वक्री ग्रह के फल

सामान्य तौर पर शुभ वक्री ग्रह शुभ फल और अशुभ वक्री ग्रह अशुभ फल देते हैं। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूर्य और चंद्रमा सदैव सामान्य गति से चलते हैं और कभी वक्री नहीं होते, वहीं दूसरी ओर राहु और केतु सदैव वक्री अवस्था में स्थित होते हैं शेष ग्रह कभी वक्री और कभी मार्गी अवस्था में आते हैं। कभी-कभी कोई ग्रह एक राशि में वक्री होकर पिछली राशि में चला जाता है और कभी-कभी उसी राशि में बना रहता है। फिर जैसे ही वक्री गति समाप्त होती है वह मार्गी हो जाता है अर्थात अपनी पुरानी स्थिति के अनुसार लौट आता है। ग्रहों की वक्री गति का फल अलग अलग होता है।

यदि गुरु ग्रह वक्री है तो फल देने में देरी कर सकता है और ऐसी स्थिति में अक्सर व्यक्ति बिना माँगे दूसरों को सलाह देते हैं और धर्म से हटकर धन प्राप्ति की ओर लग जाते हैं। आमतौर पर शनि के वक्री होने पर व्यक्ति को अशुभ परिणाम अधिक प्राप्त होते हैं और उसके कामों में देरी होने लगती है। उसे अपने मेहनत का फल प्राप्त करने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है। बुध का वक्री होना निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है और ऐसे व्यक्ति अधिक बातूनी हो जाते हैं। शुक्र के वक्री होने पर व्यक्ति में भावनात्मक बदलाव आते हैं और विशेष असर उसके प्रेम और दांपत्य जीवन पर पड़ता है। मंगल का वक्री होना अधिक खराब हो सकता है क्योंकि मंगल ऊर्जा का कारक है और मंगल के वक्री होने पर व्यक्ति को अपनी उर्जा को इस्तेमाल करने की दिशा समझना बड़ा मुश्किल होता है, इसलिए अक्सर वह अपनी उर्जा का दुरुपयोग करते हैं जिसकी वजह से परेशानी उठाता है।

इस प्रकार हम विभिन्न ग्रहों की वक्री अवस्था में आने और फिर मार्गी होने की तिथि और समय उपरोक्त तालिका के माध्यम से जान सकते हैं।

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दिया गया यह लेख आपको ग्रहों की वक्री स्थिति को समझाने में सहायक साबित होगा और इसकी सहायता से आप अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में शुभ फल प्राप्त कर पाएंगे।

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